श्री दुर्गा कवच पाठ हिंदी अर्थ सहित | Durga Kavach

श्री दुर्गा कवच का संपूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित पढ़ें। जानें दुर्गा कवच के श्लोक, पाठ का महत्व और माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना।

श्री दुर्गा कवच पाठ हिंदी अर्थ सहित | Durga Kavach

श्री दुर्गा कवचम् – संस्कृत पाठ एवं हिंदी अर्थ

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

॥ मार्कण्डेय उवाच ॥

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

महर्षि मार्कण्डेय जी ने कहा—हे पितामह! संसार में ऐसा कौन-सा परम गोपनीय साधन है, जो मनुष्यों की हर प्रकार से रक्षा करता है और जिसे आपने अब तक किसी के सामने प्रकट नहीं किया है? कृपया मुझे वह बताइए।

॥ ब्रह्मोवाच ॥

अस्ति गुह्यतमं विप्रा सर्वभूतोपकारकम्।
दिव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥2॥

ब्रह्माजी ने कहा—हे महामुने! देवी का दिव्य कवच ही ऐसा परम गोपनीय और पवित्र साधन है, जो समस्त प्राणियों का कल्याण करने वाला है। आप इसे ध्यानपूर्वक सुनिए।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥

माँ दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्मचारिणी, तीसरा चन्द्रघण्टा और चौथा स्वरूप कूष्माण्डा कहलाता है।

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥

माँ का पाँचवाँ स्वरूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से जाना जाता है।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥

माँ दुर्गा का नौवाँ स्वरूप सिद्धिदात्री है। ये नौ स्वरूप नवदुर्गा कहलाते हैं। इन पवित्र नामों का वर्णन स्वयं ब्रह्माजी ने किया है।

अग्निना दह्यमानास्तु शत्रुमध्ये गता रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥

जो व्यक्ति अग्नि से घिरा हो, रणभूमि में शत्रुओं के बीच फँस गया हो या किसी कठिन संकट में पड़कर भयभीत हो, यदि वह माँ दुर्गा की शरण में जाता है, तो देवी उसकी रक्षा करती हैं।

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥7॥

माँ की शरण में रहने वाले भक्त का संकट की घड़ी में भी अमंगल नहीं होता। देवी की कृपा से उसके जीवन में शोक, दुःख और भय दूर होते हैं।

यैस्तु भक्त्या स्मृता नित्यं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥

जो भक्त प्रतिदिन श्रद्धा और भक्ति से देवी का स्मरण करते हैं, उनका कल्याण और उन्नति होती है। हे देवेश्वरी! जो आपका ध्यान करते हैं, उनकी रक्षा आप निश्चय ही करती हैं।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥

माँ चामुण्डा प्रेत पर विराजमान हैं, वाराही का वाहन भैंसा है, ऐन्द्री हाथी पर सवार हैं और वैष्णवी गरुड़ पर विराजती हैं।

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥

माँ माहेश्वरी वृषभ पर और कौमारी मोर पर विराजती हैं। भगवान विष्णु की प्रिया देवी लक्ष्मी कमल के आसन पर बैठी हैं और उनके हाथों में कमल सुशोभित है।

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥

ईश्वरी देवी श्वेत स्वरूप धारण करके वृषभ पर विराजती हैं। ब्राह्मी देवी हंस पर सवार हैं और अनेक आभूषणों से सुशोभित हैं।

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥12॥

ये सभी मातृशक्तियाँ दिव्य योगशक्तियों से संपन्न हैं। इनके शरीर अनेक प्रकार के आभूषणों और रत्नों से सुशोभित हैं।

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥14॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥15॥

ये सभी देवियाँ रथों पर सवार होकर दिव्य तेज और पराक्रम से युक्त दिखाई देती हैं। इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मूसल, ढाल, तोमर, फरसा, पाश, भाला, त्रिशूल और उत्तम धनुष जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं। ये शस्त्र दैत्यों का विनाश करने, भक्तों को निर्भय बनाने और देवताओं का कल्याण करने के लिए धारण किए गए हैं।

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥

हे अत्यंत रौद्र स्वरूप वाली देवी! आपका पराक्रम महान और शक्ति अपार है। आप अत्यंत उत्साह और सामर्थ्य से संपन्न हैं तथा बड़े से बड़े भय का नाश करने वाली हैं। आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी॥18॥

हे देवी! आप शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली और आपके तेज का सामना करना कठिन है। मेरी रक्षा कीजिए। पूर्व दिशा में ऐन्द्री, आग्नेय कोण में अग्निदेवता, दक्षिण दिशा में वाराही, नैऋत्य कोण में खड्गधारिणी, पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्य कोण में मृग पर सवार देवी मेरी रक्षा करें।

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा॥19॥

उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान कोण में शूल धारण करने वाली देवी मेरी रक्षा करें। ऊपर की ओर से ब्रह्माणी और नीचे की ओर से वैष्णवी मेरी रक्षा करें।

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥20॥

शव को वाहन बनाने वाली माँ चामुण्डा मेरी दसों दिशाओं से रक्षा करें। माँ जया आगे से और माँ विजया पीछे से मेरी रक्षा करें।

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥

माँ अजिता मेरे बाएँ भाग की और अपराजिता दाएँ भाग की रक्षा करें। शिखा की रक्षा उद्योतिनी देवी करें और मस्तक पर विराजमान माँ उमा मेरी रक्षा करें।

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥

माँ मालाधरी मेरे ललाट की और यशस्विनी मेरी दोनों भौंहों की रक्षा करें। भौंहों के मध्य त्रिनेत्रा और नासिका की यमघण्टा देवी रक्षा करें।

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी॥23॥

शंखिनी देवी मेरी आँखों के मध्य भाग की और द्वारवासिनी दोनों कानों की रक्षा करें। माँ कालिका मेरे दोनों गालों की और शांकरी कानों के मूल भाग की रक्षा करें।

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥

सुगंधा देवी मेरी नाक की, चर्चिका ऊपरी होंठ की और अमृतकला निचले होंठ की रक्षा करें। माँ सरस्वती मेरी जिह्वा की रक्षा करें।

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥

माँ कौमारी मेरे दाँतों की और चण्डिका कंठ की रक्षा करें। चित्रघण्टा गले की और महामाया तालु की रक्षा करें।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥

माँ कामाक्षी मेरी ठोड़ी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करें। भद्रकाली मेरी गर्दन की तथा धनुष धारण करने वाली देवी मेरी रीढ़ की रक्षा करें।

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥

नीलग्रीवा देवी मेरे कंठ के बाहरी भाग की और नलकूबरी कंठ की नली की रक्षा करें। खड्गिनी मेरे दोनों कंधों की तथा वज्रधारिणी मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करें।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेन्नरेश्वरी॥28॥

दण्डिनी देवी मेरे दोनों हाथों की, अम्बिका मेरी उँगलियों की और शूलेश्वरी मेरे नाखूनों की रक्षा करें। नरेश्वरी मेरे पेट की रक्षा करें।

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥

महादेवी मेरे दोनों स्तनों की और शोक का नाश करने वाली देवी मेरे मन की रक्षा करें। माँ ललिता हृदय की और शूलधारिणी उदर की रक्षा करें।

नाभौ च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
मेढ्रं रक्षतु दुर्गन्धा पायुं मे गुह्यवाहिनी॥30॥

माँ कामिनी मेरी नाभि की और गुह्येश्वरी गुप्त अंगों की रक्षा करें। दुर्गन्धा देवी जननेंद्रिय की और गुह्यवाहिनी गुदा की रक्षा करें।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥

भगवती मेरी कमर की और विन्ध्यवासिनी दोनों घुटनों की रक्षा करें। महाबला देवी मेरी दोनों जाँघों और पिंडलियों की रक्षा करें तथा मेरी शुभ कामनाएँ पूर्ण करें।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥

नारसिंही देवी मेरे टखनों की और तैजसी पैरों के ऊपरी भाग की रक्षा करें। श्रीदेवी पैरों की उँगलियों की और तलवासिनी पैरों के तलवों की रक्षा करें।

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥

दंष्ट्राकराली देवी मेरे नाखूनों की और ऊर्ध्वकेशिनी मेरे बालों की रक्षा करें। कौबेरी देवी रोमकूपों की तथा वागीश्वरी मेरी त्वचा की रक्षा करें।

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥35॥

माँ पार्वती मेरे रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डियों और मेद की रक्षा करें। कालरात्रि मेरी आँतों की और मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें। पद्मावती शरीर के कमल-स्वरूप अंगों की, चूड़ामणि कफ की, ज्वालामुखी नाखूनों के तेज की और अभेद्या देवी शरीर के सभी जोड़ों की रक्षा करें।

शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥

माँ ब्रह्माणी मेरे शुक्र की, छत्रेश्वरी मेरी छाया की और धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥

वज्र धारण करने वाली देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—इन पाँचों प्राणवायु की रक्षा करें। कल्याणमयी देवी मेरे जीवन और प्राणों की रक्षा करें।

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥

योगिनी देवी रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श—इन सभी इंद्रिय विषयों में मेरी रक्षा करें। माँ नारायणी मेरे सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों की रक्षा करें।

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥

माँ वाराही मेरी आयु की और वैष्णवी मेरे धर्म की रक्षा करें। चक्र धारण करने वाली देवी मेरे यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणी मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥

माँ इन्द्राणी मेरे कुल और गोत्र की रक्षा करें। हे चण्डिके! मेरे पशुओं की रक्षा करें। महालक्ष्मी मेरी संतान की और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करें।

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥

सुपथा देवी मेरी यात्रा के पथ की और क्षेमकरी मेरे मार्ग की रक्षा करें। महालक्ष्मी राजदरबार या महत्वपूर्ण स्थानों पर मेरी रक्षा करें और सर्वत्र विराजमान माँ विजया हर दिशा से मेरी रक्षा करें।

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥

हे जयन्ती और पापनाशिनी देवी! शरीर या जीवन का जो भी स्थान इस कवच में छूट गया हो, उसकी भी आप स्वयं रक्षा करें।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥

जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे इस कवच की महिमा को ध्यान में रखना चाहिए। इस कवच से सुरक्षित होकर वह जहाँ भी जाता है, देवी की कृपा उसके साथ रहती है।

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥44॥

ऐसे भक्त को अपने कार्यों में सफलता और शुभ फल प्राप्त होते हैं। वह जिस उचित मनोकामना को लेकर देवी का स्मरण करता है, माँ की कृपा से उसे उसकी प्राप्ति होती है।

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्।
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः॥45॥

इस कवच का श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाला व्यक्ति संसार में उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करता है। वह भय से मुक्त होकर कठिन संघर्षों का सामना करने का साहस पाता है।

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्॥46॥

देवी के इस कवच से सुरक्षित भक्त तीनों लोकों में सम्मान पाने योग्य होता है। देवी का यह कवच अत्यंत दुर्लभ और दिव्य माना गया है।

यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः।
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः॥47॥

जो व्यक्ति पवित्र मन से प्रतिदिन तीनों संध्याओं में श्रद्धापूर्वक इस कवच का पाठ करता है, उस पर देवी की विशेष कृपा बनी रहती है और वह जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में समर्थ होता है।

जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः॥48॥

इस कवच की महिमा के अनुसार, नियमित श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले को दीर्घायु और आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है तथा अनेक प्रकार के कष्टों से रक्षा होती है।

स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्।
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले॥49॥

स्थिर, चलायमान या कृत्रिम रूप से उत्पन्न विष तथा अन्य हानिकारक प्रभावों से रक्षा के लिए देवी का स्मरण कल्याणकारी माना गया है।

भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः।
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा॥50॥

पृथ्वी, आकाश और जल में विचरण करने वाली नकारात्मक शक्तियों तथा डाकिनी-शाकिनी आदि से रक्षा के लिए देवी के इस कवच का महत्त्व बताया गया है।

अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः॥51॥

आकाश में विचरण करने वाली भयानक शक्तियों, डाकिनियों, ग्रहों के अशुभ प्रभावों, भूत-प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व और राक्षस आदि से देवी रक्षा करती हैं।

ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः।
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते॥52॥

ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि का भय भी उस भक्त के पास नहीं टिकता, जिसके हृदय में देवी के कवच के प्रति श्रद्धा और विश्वास स्थापित है।

मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्।
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले॥53॥

इस कवच के पाठ से व्यक्ति के सम्मान और तेज में वृद्धि होती है। वह अपने अच्छे कर्मों से यश और कीर्ति प्राप्त करता है।

जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा।
निर्विघ्नेन
भवेत्सिद्धिश्चण्डीजपसमुद्भवा॥54॥

चण्डी सप्तशती का पाठ करने से पहले देवी कवच का पाठ करना शुभ माना गया है। ऐसा करने से चण्डी पाठ बिना विघ्न के पूर्ण हो और साधना का फल प्राप्त हो—ऐसी मान्यता है।

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥55॥

जब तक पर्वतों, वनों और जंगलों सहित यह पृथ्वी विद्यमान रहेगी, तब तक इस कवच के पुण्य प्रभाव से भक्त के वंश और संतान की वृद्धि बनी रहने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥56॥

महामाया भगवती की कृपा से भक्त को देह त्यागने के बाद ऐसा परम स्थान प्राप्त होता है, जिसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ बताया गया है।

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥57॥

देवी की कृपा से साधक परम कल्याण को प्राप्त करता है और भगवान शिव के सान्निध्य में आनंद अनुभव करता है।

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं देवीकवचं सम्पूर्णम् ॥

इस प्रकार श्री मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी कवच का पाठ पूर्ण होता है। माँ दुर्गा सभी भक्तों का कल्याण करें।